दक्षिण एशिया के आतंकी गलियारों में एक बार फिर खलबली मच गई है। प्रतिबंधित संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के शीर्ष कमांडर और 26/11 मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद के बेहद करीबी सहयोगी शेख यूसुफ अफरीदी की रविवार को गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह हत्या पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के लांडी कोतल इलाके में हुई, जो राजधानी इस्लामाबाद से लगभग 250 किलोमीटर दूर है।
अफरीदी की हत्या कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की धरती पर छिपे आतंकी आकाओं के “रहस्यमयी” खात्मे की कड़ी का नवीनतम हिस्सा है। जैसे-जैसे “अज्ञात बंदूकधारी” सर्जिकल स्ट्राइक की तरह सटीक वार कर रहे हैं, पाकिस्तान में आतंकियों के लिए बने “सुरक्षित ठिकाने” अब असुरक्षित साबित हो रहे हैं।
लांडी कोतल में खूनी खेल
स्थानीय पुलिस रिपोर्टों के अनुसार, शेख यूसुफ अफरीदी को उस समय निशाना बनाया गया जब वह अफगान सीमा के पास एक रणनीतिक पारगमन बिंदु, लांडी कोतल में मौजूद था। चश्मदीदों का कहना है कि मोटरसाइकिल पर सवार कम से कम दो हमलावरों ने अफरीदी पर बेहद करीब से अंधाधुंध गोलियां बरसाईं।
खैबर पुलिस के एक अधिकारी ने मीडिया को बताया, “हमलावरों ने स्वचालित हथियारों का इस्तेमाल किया और अफरीदी को गोलियों से छलनी करने के बाद जखाखेल इलाके की संकरी गलियों से फरार हो गए।” अफरीदी की मौके पर ही मौत हो गई। हालांकि पुलिस ने उच्च स्तरीय जांच शुरू कर दी है, लेकिन अब तक किसी भी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है।
कौन था शेख यूसुफ अफरीदी?
अफरीदी केवल एक “धार्मिक विद्वान” नहीं था, जैसा कि कुछ स्थानीय समर्थक उसे पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। खुफिया एजेंसियां लंबे समय से उसे उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख लॉजिस्टिक समन्वयक के रूप में देखती रही हैं।
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भर्ती विशेषज्ञ: वह खैबर पख्तूनख्वा के जनजातीय क्षेत्रों से युवाओं को लश्कर की आतंकी गतिविधियों के लिए कट्टरपंथी बनाने और उन्हें भर्ती करने में माहिर था।
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हाफिज सईद का विश्वासपात्र: वह लाहौर की कोट लखपत जेल में बंद हाफिज सईद के करीबी घेरे के साथ सीधे संपर्क में रहता था।
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जनजातीय प्रभाव: प्रभावशाली ‘जखाखेल’ कबीले से ताल्लुक रखने के कारण, उसने लश्कर को उस इलाके में सामाजिक और भौगोलिक आधार प्रदान किया था, जहाँ आमतौर पर तालिबान का दबदबा रहता है।
“अज्ञात बंदूकधारियों” का बढ़ता खौफ
अफरीदी की मौत लश्कर के लिए दूसरा बड़ा झटका है। महज दस दिन पहले, 16 अप्रैल 2026 को लश्कर के सह-संस्थापक और सईद के बाद सबसे महत्वपूर्ण नेता अमीर हमजा पर लाहौर में जानलेवा हमला हुआ था। मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने हमजा की कार पर गोलियां चलाईं, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गया था।
इन हमलों ने पाकिस्तान के सुरक्षा प्रतिष्ठान के भीतर एक “आरोप-प्रत्यारोप” का खेल शुरू कर दिया है। जहाँ कुछ अधिकारी “विदेशी खुफिया एजेंसियों” का हाथ होने की बात कह रहे हैं, वहीं अन्य इसे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और लश्कर समर्थित विद्वानों के बीच की खूनी वैचारिक जंग का हिस्सा मान रहे हैं।
“हालिया घटनाओं से पता चलता है कि लश्कर के नेतृत्व को व्यवस्थित रूप से खत्म किया जा रहा है। चाहे यह आंतरिक संघर्ष हो या बाहरी गुप्त ऑपरेशन, यह साफ है कि पाकिस्तान में आतंकियों के ‘सेफ हेवन’ अब सुरक्षित नहीं रहे,” डॉ. अरिश कुमार, आतंकवाद विरोधी विशेषज्ञ का कहना है।
क्षेत्रीय तनाव: अफगानिस्तान कनेक्शन
इन हत्याओं का समय काफी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान फिलहाल अफगान तालिबान के साथ गंभीर सीमा विवाद में उलझा हुआ है। 2026 की शुरुआत में, पाकिस्तान ने पूर्वी अफगानिस्तान में टीटीपी के ठिकानों के खिलाफ ‘ऑपरेशन गजब लिल हक’ शुरू किया था।
विशेषज्ञों का मानना है कि टीटीपी जैसे संगठन, जो पाकिस्तानी सेना के दबाव में हैं, लश्कर जैसे “राज्य-प्रायोजित” समूहों के नेताओं को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं।
लश्कर के साम्राज्य का अंत?
हाफिज सईद द्वारा 1987 में स्थापित लश्कर-ए-तैयबा दशकों तक जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों का मुख्य चेहरा रहा। हालांकि, FATF के वैश्विक दबाव और भारत की कूटनीतिक जीत ने पाकिस्तान को इस संगठन पर कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया। अब हाफिज सईद के जेल में होने और उसके कमांडरों के एक-एक करके मारे जाने के बाद, यह संगठन अपने सबसे बड़े अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है।
बदलता परिदृश्य
शेख यूसुफ अफरीदी का खात्मा पाकिस्तान में भारत-विरोधी आतंकियों की “रहस्यमयी” मौतों की सूची में एक और नाम जोड़ता है। कराची में अदनान अहमद से लेकर सियालकोट में शाहिद लतीफ और अब खैबर में अफरीदी तक, यह सिलसिला जारी है।
जहाँ पाकिस्तानी हुकूमत “अज्ञात हमलावरों” की पहचान पर चुप्पी साधे हुए है, वहीं आतंकियों को संदेश स्पष्ट मिल चुका है: अब साये भी उनका पीछा कर रहे हैं। लाहौर और खैबर के निवासियों के लिए ये सरेआम हत्याएं इस बात का संकेत हैं कि जिन आतंकी नेटवर्क को उन्होंने पनाह दी थी, अब वही आग उनके घरों तक पहुंच गई है।

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